
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की गरिमा और उसकी प्रगति की आधारशिला होती है। एक मजबूत और सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली ही राष्ट्र को आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी रूप से सशक्त बनाती है। परंतु यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि ओडिशा जैसे महान सांस्कृतिक इतिहास वाले राज्य में शिक्षा प्रणाली लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रही है।राज्य के ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं जैसे पक्की इमारतें, पेयजल, बिजली और डिजिटल उपकरणोंकी भारी कमी है। योग्य शिक्षकों के रिक्त पद और स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। इसके परिणामस्वरूप, सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता लगातार गिर रही है, जिससे गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्रों को सबसे अधिक नुकसान हो रहा है।
लेकिन केंद्र सरकार ने 2047 तक ‘डेवलप्ड इंडिया’ और राज्य सरकार ने 2036 तक ‘डेवलप्ड ओडिशा’ बनाने का दूर की सोच वाला लक्ष्य रखा है। लेकिन, ओडिशा के मौजूदा एजुकेशन सिस्टम में दिख रही गड़बड़ियां और अनदेखी इस डेवलपमेंट की राह में एक बड़े कांटे की तरह हैं।
आज के हालात में, राज्य के प्राइमरी और हायर एजुकेशन दोनों सेक्टर बहुत कमज़ोर हालत में हैं। गांव से लेकर शहरी इलाकों तक के कई स्कूलों में काबिल टीचरों की कमी, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, पढ़ाई की खराब क्वालिटी और मैनेजमेंट की गलतियों से स्टूडेंट्स पर असर पड़ रहा है। अगर प्राइमरी एजुकेशन लेवल कमज़ोर रहता है, तो इसका असर हायर एजुकेशन लेवल पर साफ दिखता है। हायर एजुकेशन और रिसर्च के फील्ड में भी मॉडर्न टेक्नोलॉजी, सही लाइब्रेरी और वोकेशनल एजुकेशन की कमी युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता की ओर धकेल रही है।
एक विकसित ओडिशा के निर्माण के लिए आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, शहरीकरण, विज्ञान, कृषि विकास के साथ-साथ शिक्षा क्षेत्र का विकास अनिवार्य है। लेकिन वर्तमान स्थिति में, राज्य में प्राथमिक और उच्च शिक्षा दोनों ही बेहद कमजोर स्थिति में हैं। शिक्षा प्रणाली की रीढ़ प्राथमिक शिक्षा है, यदि बच्चों को यह शिक्षा ठीक से न दी जाए, तो शिक्षा की नींव का ढह जाना स्वाभाविक है। पहले लोग बच्चों से कहते थे, ‘अगर पढ़ाई नहीं करोगे तो मंदबुद्धि बन जाओगे’, लेकिन अब समय आ गया है कि अगर बच्चा पढ़ता भी है, तो भी वह मंदबुद्धि ही कहलाएगा। कभी-कभी, जब किसी मुद्दे पर बहस होती है, तो अपनी बात साबित करने के लिए किताबों का सहारा लिया जाता है, क्योंकि सभी को किताबों पर भरोसा होता है और माना जाता है कि उनमें दी गई जानकारी सही है। लेकिन इस साल, राज्य में नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद, स्कूल और लोक शिक्षा विभाग द्वारा वितरित पहली से आठवीं कक्षा की किताबों में त्रुटियों के कारण ओडिशा की शिक्षा प्रणाली एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं के घेरे में आ गई है। सवाल उठता है कि क्या इन किताबों को पढ़कर ओडिशा 2036 तक एक विकसित ओडिशा बन पाएगा बोलके प्रस्फ़्न उठताहे ।
राज्य के कई स्कूलों में आवश्यक शिक्षकों और बुनियादी ढांचे की कमी है। कुछ जगहों पर एक शिक्षक पांच कक्षाओं के बच्चों को पढ़ा रहा है, और कुछ जगहों पर पांच कक्षाओं के बच्चे एक ही कक्षा में पढ़ रहे हैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा वित्त वर्ष 2025-26 के लिए प्रकाशित एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (शिक्षा प्लस) रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 1458 स्कूलों में केवल एक शिक्षक ही पढ़ा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में एकल शिक्षक विद्यालयों की संख्या 2023 से बढ़ रही है। 2023-24 में ओडिशा में एक शिक्षक वाले विद्यालयों की संख्या 1065 थी और 2024-25 में यह बढ़कर 1089 हो गई। लेकिन 2025-26 तक यह संख्या 34 प्रतिशत बढ़कर 1458 हो गई, जिससे इन विद्यालयों में पढ़ने वाले 60,000 छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 52 लाख छात्र ओडिया माध्यम के विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। लेकिन शिक्षा व्यवस्था की यह स्थिति उनके भविष्य को अंधकारमय बना रही है। सरकारी और निजी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में भेजने के बजाय निजी विद्यालयों को क्यों चुनते हैं? इसका कारण यह है कि लोगों को दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं है। इसी तरह, राष्ट्रीय परीक्षाओं और राष्ट्रीय भर्तियों में ओडिया माध्यम के छात्रों के निराशाजनक प्रदर्शन पर भी कई सवाल उठते हैं। लेकिन इस समस्या के मूल कारण को दूर करने के लिए पर्याप्त तत्परता नहीं दिखाई जा रही है।
राज्य में उच्च शिक्षा की स्थिति और भी दयनीय है। देखा जा सकता है कि राज्य के लगभग सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता से कम है; जिससे शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन में भी बाधा उत्पन्न हुई है। उच्च शिक्षा विभाग ने 2024 में निजी सहायता प्राप्त कॉलेजों में 786 पदों को भरने के लिए एक अधिसूचना जारी की थी, लेकिन यह अभी भी उच्च न्यायालय में लंबित है।
परिणामस्वरूप, खाली शिक्षकों वाले कॉलेजों में शिक्षण कार्य बाधित हुआ है। इस समस्या के समाधान के लिए, राज्य सरकार ने विभिन्न कॉलेजों में खाली शिक्षकों के पदों पर सेवानिवृत्त शिक्षकों की पुनः नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी है। ऐसे समय में जब राज्य में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या चिंताजनक है, सेवानिवृत्त शिक्षकों की पुनः नियुक्ति ने भावी शिक्षकों के सपनों को चकनाचूर कर दिया है। उच्च न्यायालय ने सरकार के इस कदम की निंदा करते हुए नियुक्ति पर रोक लगा दी है। इसके अलावा, विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुसंधान प्रभावित हुए हैं। हाल ही में, सरकार ने बालवाड़ी से स्नातकोत्तर तक मुफ्त शिक्षा की घोषणा की है, जो शिक्षा के विकास के लिए एक स्वागत योग्य कदम है। इसलिए, ओडिशा के विकास के लिए शिक्षा को निःशुल्क घोषित करना और इसे शिक्षा से संबंधित योजना बनाना ही पर्याप्त नहीं है; इसका उचित कार्यान्वयन, उपयुक्त अवसंरचना का विकास और भविष्य में शिक्षा आधारित उपयुक्त रोजगारों का सृजन ही इसके उद्देश्य को पूरा कर सकता है। ‘विकसित ओडिशा – 2036’ के सपने को साकार करने के लिए स्वास्थ्य, उद्योग, अर्थव्यवस्था, विज्ञान और कृषि के साथ-साथ शिक्षा का विकास भी महत्वपूर्ण है। शिक्षा के विकास के बिना विकसित ओडिशा का सपना साकार नहीं हो सकता।
