आज का समाज , सोशियाल मीडिया

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हमारे देश में कुल आबादी के 80 परसेंट लोग अब मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करते हैं। जिसमें से करीब 40 से 45 परसेंट लोग इंटरनेट से जुड़े हैं। करीब 32 परसेंट लोग सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि हमारे आज के समाज में सोसियाल मीडिया की कितनी गहरी हो सकती है। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर कोई Facebook, WhatsApp, YouTube, X जैसे सोशल मीडिया का आदी हो गया है। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और सोसियाल मीडिया आज की ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा बन गए हैं। अब घटनाएँ, खबरें और जानकारी हमारी उंगलियों पर हैं। किसी भी मुद्दे पर अपनी राय ज़ाहिर करने में कोई पीछे नहीं रहता। जैसे ही कोई घटना होती है, अच्छी और बुरी राय तुरंत सोशल मीडिया पर दिखने लगती है। इससे हमारी रोज़ की लाइफ़स्टाइल पर बहुत असर पड़ता है। हमारे फ़ैसले हमारी अपनी बेसिक सोच और सोच से ज़्यादा सामाजिक गनमध्यम  की सोच से प्रभावित हो रहे हैं। तो, कोई कुछ राय किसे शेयर कर रहा है, जो बिना किसी लड़ाई-झगड़े के सोशियाल मीडिया पर फैल जाती है। जिसे लेकर संबंधित व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान रहता है। इसलिए, सोशल मीडिया कभी-कभी दिक्कतें खड़ी कर देता है। दूसरी ओर, हमारी जानकारी के बिना हम किसी खास सोच के अंधे समर्थक बन जाते हैं।

एक समय था जब विद्वान ब्यक्ति किसी भी मुद्दे पर कॉन्फ्रेंस के ज़रिए अपनी राय ज़ाहिर करते थे। अखबारों में उस पर रिपोर्ट छपती थीं। लोग पढ़ते और जानते थे। कई एक्सपर्ट किताबों के ज़रिए अपनी राय ज़ाहिर करते थे। समय बदल रहा है। अब 24 घंटे सैकड़ों टीवी चैनल हैं। अखबार, मैगज़ीन और किताबों की भरमार है। इसके अलावा, पिछले कुछ सालों में ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, ब्लॉग, डिजिटल मीडिया जैसे सोशियाल मीडिया का फैलाव हुआ है। इसकी आसानी और आसानी की वजह से, हर मुद्दे पर, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, हज़ारों रिएक्शन तुरंत और तेज़ी से फैल रहे हैं। लोग अब अखबार या टीवी का इंतज़ार नहीं करते। जैसे ही कोई घटना होती है या कोई मुद्दा सामने आता है, वह तेज़ी से सोशल मीडिया पर चलने लगता है। जैसे ही किसी नेता के मुंह से कोई बात निकलती है, लोग उस पर कमेंट करना शुरू कर देते हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों का ‘IT सेल’ इसके लिए काम कर रहा है। ‘ट्रोल’ करने के लिए ट्रेंड समर्थक तैयार हैं। सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी विचारधारा का प्रचार-प्रसार बहुत ही सुनियोजित और व्यवस्थित तरीके से चल रहा है।

आज के समाज में, बोलने की आज़ादी को बनाने में सामाजिक मीडिया का बड़ा रोल रहा है। अपनी आसानी और स्पीड की वजह से, सोसियाल मीडिया मेनस्ट्रीम मीडिया को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ रहा है। लेकिन कभी-कभी, इसकी छत्रछाया में गलत जानकारी, गुमराह करने वाले आंकड़े और नफ़रत भरे कमेंट्स फैलाए जा रहे हैं। नतीजतन, सामाजिक मेलजोल, शांति और भाईचारा खत्म हो रहा है। कुछ नासमझ लोग ऐसे प्रोपेगैंडा से प्रभावित होकर हिंसा और दंगे जैसे अमानवीय काम कर रहे हैं।

पिछले बिहार चुनाव के दौरान अलग-अलग मुद्दों पर सामाजिक मीडिया पर घूम रहे विवादित वीडियो इसका उदाहरण हैं। जो भी हिंसक स्थिति बनती है, उसका सपोर्ट नहीं किया जा सकता। यह स्वस्थ सामाजिक मेलजोल के लिए खतरा है। हमारे संविधान ने हमें बिना किसी डर और दबाव के अपनी आज़ाद राय या असहमति ज़ाहिर करने का अधिकार दिया है। लेकिन विरोध के नाम पर हिंसा पूरी तरह से निंदनीय है।

अभी, सोशल मीडिया का ऐसा गलत इस्तेमाल सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है। हालांकि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट act-2000 में बनाया गया था, लेकिन ऐसा लगता है कि यह कानून सोसियाल  मीडिया को नियंत्रणा करने में नाकाम रहा है। इसलिए, केंद्र सरकार ने सोसियाल मीडिया को नियंत्रणा करने के लिए एक रेगुलेशन जारी किया है। उम्मीद है कि ऐसी कोशिशों से जानकारी के लेन-देन, राय फैलाने और मैसेज भेजने में कुछ छूट मिलेगी। नफ़रत फैलाने वाले लोगोकों  पहचान की जा सकेगी और उसे फैलने बाले नफ़रत से रोका जा सकेगा।

कुछ ग्रुप जो बोलने की आज़ादी का अलग मतलब निकालते हैं, वे इन नियमों का कड़ा विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि ऐसे नियम अपनी राय खुलकर कहने के अधिकार को कम कर देंगे। उनका आरोप है कि सरकार इन नियमों के ज़रिए असहमति को दबाने की कोशिश कर रही है। उनका डर बेबुनियाद नहीं है।

इस मामले में केंद्र सरकार की हाल के दिनों में कई मामलों में तुरंत कार्रवाई और गिरफ़्तारियाँ किया हैं। सबै सरकार कभी भी देश की होती मे नहीं। एक डेमोक्रेटिक देश में सरकारें आती-जाती रहती हैं। जब सरकार बदलती है, तो सरकार के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार के सभी फ़ैसले देश के हित के लिए होते हैं। इसलिए, एक स्वस्थ डेमोक्रेटिक समाज में सरकार के ख़िलाफ़ विरोध की आवाज़ को भी दबाया नहीं जाना चाहिए। ऐसे मामलों में सोशल मीडिया ज़्यादा काम का लगता है। समाज के निचले तबके की आवाज़ें भी सोशल मीडिया के ज़रिए पूरी दुनिया में पहुँच रही हैं। दुनिया के किसी भी हिस्से में हो रही घटनाओं पर पूरी दुनिया से रिएक्शन आ रहे हैं। सोशल मीडिया ने ज्योग्राफिकल सीमाएं तोड़ दी हैं। आज के समाज पर सोशल मीडिया के असर को रोका नहीं जा सकता। अगर सोशल मीडिया यूज़र्स सावधानी, संयम और सहनशीलता बनाए रखें, तो यह असरदार मीडिया ज़रूर एक बेहतर समाज बनाने में मदद करेगा।

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